जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम
इधर तो काफी दिन हो गये कुछ लिखा नहीं मैंने. इस कारण से एक अच्छी रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ. यह रचना विनोद श्रीवास्तव की है, इन्हें मैं नहीं जनता हूँ. लेकिन इनकी कविता के माध्यम से इन्हें जान गया हूँ. ये कविता मेरे दोस्त मनोज ने (भोपाल से) मुझे भेजी है....
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अवाम
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[30 Oct 2009 08:53 AM]



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