फांस
लगी पलंग टटोलने, व्याकुल होकर आज। उठी तुंरत विचारने, रात्री के परिहास॥ कहीं मतंग तरंग में, निकली ऐसी बात। लगी पिया के ह्रदय, गहरी कोई फांस॥ चली भ्रमित देखने, रुकी हुई है साँस। लगी भयभीता फिरने, बुझी हुई है आस॥ तभी किचन की ओर से, आई एक आवाज। बर्तन सार...
[पूरी पोस्ट]
KNKAYASTHA "नीरज"
Hindi-Poems
22
3
0
3
9
[30 Oct 2009 08:17 AM]



Shuffle








