यूँ ही

हृदय गवाक्ष सुबह से रोक रही हूँ खुद को, मगर नही रुक पाई आख़िर....! बस लिखती चली जा रही हूँ जुनून में...यहाँ क्यों लिख रही हूँ ? पता नही.... सुबह से कई जगह दिमाग लगाना चाहा मगर नही.... यही आ कर लग जता है। बार बार प्रश्न आ रहे हैं। क्या जिंदगी का कोई फॉर्मूला भी ह... [पूरी पोस्ट]
writer कंचन सिंह चौहान

यूँ ही

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[30 Oct 2009 06:50 AM]

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