दोहे
जो माटी से तन बना, महता कम ना होत बिन दीया कैसे भला, जलती कोई जोत पोथी सब कंठस्थ, पर, खुली न मन की गाँठ नलिका* पर लटका हुआ, तोता करता पाठ मिलन विरह दोनों सुखद, प्रेम करे यदि वास कस्तूरी सा, हृदय में, फैले मधुर सुवास सुलगे भुस तो देर तक, धुँआ भरे आकास...
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प्रताप नारायण सिंह
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[30 Oct 2009 04:53 AM]



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