मैं बस अकेले ही चलना चाहती हूँ
मैं हँसना चाहती थी मैं कुछ लम्हों को अपनी यादो में शामिल करना चाहती थी मैं कुछ खुशियों को अपने दामन में संभाल कर रखना चाहती थी मैं वो नदिया की चंचल धारा थी जो बिना रुके हँसते गुनगुनाते बहती जा रही थी जिंदगी के गमों के सायों को धता बताती जा रही थी लोग...
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Shobhna Choudhary
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[22 Oct 2009 13:55 PM]



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