सब चोरियाँ मुबारक !
रात का शिकवा कि दिन जाने को था मेरी दहलीज पार कर मुट्ठी भर सितारे चुरा कर ले गया दिन का शिकवा कि रात जाने को थी मेरी दहलीज पार कर के मुट्ठी भर किरणें चुरा कर ले गयी होंठ चांदी के कटोरे थे मिसरी का एक टुकडा घोल कर -- फिर रात मुस्कराई और दिन हँस दिया स...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[29 Oct 2009 08:13 AM]



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