कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ...

अनुभव कबीर, जिन्हें पढ़ते वक्त खोने का अहसास होता है। आज जब कौन ठगवा नगरिया लूटल हो    पढ़ रहा था, तब मुझे अपने गांव में निरगुण गाने वाले अनहद की याद आ गई। वह इसे जब सस्वर  सुनाता है तो आंखे खुलती नहीं रहती है। वह खासकर कबीर की इस पंक्त... [पूरी पोस्ट]
writer गिरीन्द्र नाथ झा
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[29 Oct 2009 08:10 AM]

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