मासूम माओवादी, और भूख दो कौर रोटी की. उफ!

वो चुप न रह सका मेरा दिल लरज रहा है. अभी-अभी माओवादी मासूमियत की कौशल गाथा पढ़ कर चुका हूं. मासूम, भोले, प्यारे, बेचारे नक्सली भूख से इतने बेहाल हैं कि छुरी-कांटों से लैस होकर (बंदूक तो वहां थी नहीं! कहते हैं कुछ खास लोग) ट्रेनों की पैन्टृी कार लूट रहे हैं. मजबूरी क... [पूरी पोस्ट]
writer विश्व
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[29 Oct 2009 03:53 AM]

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