गीत
ह्रदय योग कर दे , हमें मीत कर दे चलो कोई ऐसा , लिखें गीत , गायें। सूखी पडी है , नहर नेह रस की पतित पावनी गीत गंगा बहायें ॥ दृग्वृत पे मन के दिवाकर जी डूबे उचटते हुए प्रीत बंधन हैं ऊबे । कुसुम चाव के , घाव खाए पड़े हैं गीत संजीवनी कोई इनको सुनाएँ ॥ ह्र...
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Nirbhay Jain
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[29 Oct 2009 03:01 AM]



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