तुम्हारे हाथों पर ........
तुम्हारे हाथों पर मेहंदी सरीखा रच गया मै , सच कहूं कल के लिए फिर बच गया मै , खोजता था रौशनी जो मिल न पाई, छू सके जो मन ,कली वो खिल न पाई , किसके लिए खोजूं सितारों का गगन ? आदमी जब है दीयों में ही मगन , तुम नहीं सुनते कहूं क्या ,क्यों कहूं?...
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डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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[28 Oct 2009 23:18 PM]



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