आँचल में बाँध सिसकी
अपने अल्फ़ाज़ों के नश्तर
मेरे अन्तस में चुभोकर
शराफ़त का मुखौटा ओढ़े
तुम बन जाते महान सदा!
नख से शिख तक काँप उठती
आसमां सिर से ज़मीं पर आ गिरता
तन में बहता लहू लावा बन जाता
मूक रुदन से दब जाता लावा!
झूठी चमक ओढ़ चेहरे पर
खिलखिलाती मेरी सूनी बहार
रुके-रुके...
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Veena
hindi poetry
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[28 Oct 2009 16:04 PM]



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