हाहाकार
झोपड़िया की टूटी छत से
टप-टप टपकता जल
जीवन भिगोता, कँपकँपाता
इमारतें बनानेवाला तन!
फटे चिथड़ों में लिपटते
रेशमी परिधान बनानेवाले
पिचके पेट, अन्न को तरसते
जग का पेट भरने वाले !
कूड़े के ढेर पर पलते
कूड़ों का ढेर उठाने वाले
घुटने पेट में गाड़,ठिठुरते
नरम कं...
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Veena
hindi poetry
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[27 Oct 2009 14:49 PM]



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