व्यक्ति को , विकार की तरह पढ़ना , जीवन का अशुद्ध पाठ है...गाँधी और मै--अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
किसी सोच का दायरा इतना बड़ा हो सकता है ; यह गांधी जी पर सोचते हुए महसूस होता है क्योंकि गाँधी जी पर सोचना खुद पर सोचना है परिवेश पर सोचना है , इतिहास पर सोचना है , भविष्य पर सोचना है , संस्कृति पर सोचना है.....और इस सबके निराशा , उलझाव , विसंगति , प्...
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श्रीश पाठक 'प्रखर'
पंजाब
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[26 Oct 2009 22:41 PM]



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