सपनों का सफर
डॉ. अशोक प्रियरंजन तैरते हैं असंख्य सुनहरे सपने बेशुमार ख्वाहिशें जिंदगी के गीत उम्मीदों के फूल तुम्हारी आंखों में जब भी झांका हूं इन आंखों में तो महसूस की है मैने अथाह गहराई उभरते देखे हैं अनेक प्रश्न जो रह जाते हैं हर बार अनुत्तरित? अक्सर झलकती है...
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dr. ashok priyaranjan
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[26 Oct 2009 15:49 PM]



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