भ्रष्ट्र स्थितप्रज्ञ (भक्तिवेदांत)
हे अघोषित आय के परम भक्त!देहधारी जीव भले ही अपने भ्रष्ट आचरण से परम सुख प्राप्त कर ले पर नौ सौ चूहों को खाते ही हज पर चलने को तत्पर मार्जार की भांति दया,भलाई, सेवा,ईमानदारी की इच्छा फडफडाने लगती है.लेकिन परमावस्था में नोटों के बण्डल नजर आते ही वह तत्...
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प्रकाश पाखी
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[26 Oct 2009 12:46 PM]



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