गाँठ
मेरे सर्वस्व की गाँठ पानी, आग, धरा, पंचतंत्रो से गुँथी है, अक्षत, रोली, मौली, धूप, दीप से बनी है, देवी, देवताओं, खड़िया से दीवार पर सजी है, पेड़ों की फ़ुनगी पर नभ से बंधी रहती है खुलती है तो छाँव सी धूप में घुल जाती है, दिन जब चढ़ता है तो बड़ या पीपल पर म...
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रजनी भार्गव
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[26 Oct 2009 00:43 AM]



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