ग़ज़ल- छोटी-छोटी सी ख़ुशियाँ हैं

मानसी बाबुल की कच्ची कलियाँ हैं खुशियाँ रंगती फुलझड़ियाँ हैं नई मिट्टी है मन सोंधा है कटती-जुड़ती सी कड़ियाँ हैं तेरा प्यार से गाल चिकुटना छोटी-छोटी सी खुशियाँ हैं बचपन के सपनों से अब तक अम्मा की जगती अँखियाँ हैं झकमक धूप जो आंगन खेले थोड़े दिन की रंगरलियाँ है... [पूरी पोस्ट]
writer मानसी
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[25 Oct 2009 22:15 PM]

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