खुद से ही बाजी लगी है, हाय कैसी जिंदगी है

पाल ले इक रोग नादां जिंदगी के वास्ते... उधर इलाहा्बाद में वो ब्लौगर-संगोष्ठी क्या संपन्न हुयी, विवादों के नये पिटारे खुल गये हैं। समझ में नहीं आता कि हम सबलोगों ने हर चीज का सकारात्मक पहलु देखना बंद क्यों कर दिया है। एक व्यर्थ की तना-तनी के लिये सब कोई कमर कसे तैयार बैठे रहते हैं। एक पहल ह... [पूरी पोस्ट]
writer गौतम राजरिशी
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[25 Oct 2009 21:08 PM]

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