बिन जिव्हा बिन मुख किया
घुप अँधेरे दिख रही, ज्योति एक अनूप उस ज्योति में दीखते, सकल नाम, सब रूप लगते लगते लग गया , श्याम रूप पर ध्यान चातक को स्वांति मिली,मिला दिव्य वरदान बिन जिव्हा बिन मुख किया ,प्रेम सुधा का पान अपना आपा खो गया, मिला परम सोपान जिस क्षण मेरी हो गई...
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योगेश स्वप्न
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[25 Oct 2009 03:40 AM]



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