शहर
आँगन छुटा, गलियां छुटी छुटे सब संग - साथ हम से हुयी थी क्या खता हम हुए बेगाने अपने शहर मे और शहर ने हमें काफिर बना डाला ग़मों से दूर तक रिश्ता न था हम बसा रहे थे अपनी दुनिया अमन वालों ने ही जला डाली दुनिया लुट डाली हया और आँखे हमारी शहर ने हमें काफिर...
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Dhiraj Shah
शहर
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[24 Oct 2009 19:56 PM]



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