जिंदगी क़र्ज़ है
इतना तो मुझको भी मालूम था साथ साया अंधेरों में रहता नही मेरे सर पे था सूरज चमकता हुआ मगर मेरे क़दमों में साया ना था । बन के में जोगी भटकता रहा जिगर में कहीं दर्द पलता रहा सिसकता रहा आह भरता रहा बेखुद था क्या - क्या में करता रहा ! रूह बेचैन है दिल भी...
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निर्झर'नीर
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[24 Oct 2009 07:38 AM]



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