फ़ुर्सत के पल

रजनीगन्धा पलाश के दहकते फूल जब मेरी हथेली पर गिरते हैं, फिसलते हुए ये जलते सूरज मेरे मन में परिक्रमा करते हैं । ------------- परिधि के घेरे में आ बैठे हैं, कुछ चिन्ह नियुक्त कर बैठे हैं, चिन्हों से जूझते हुए परिधि में खुद को खो बैठे हैं। __________________ शब्... [पूरी पोस्ट]
writer रजनी भार्गव
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[23 Oct 2009 08:32 AM]

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