अपनी एक कहानी है.
चलते-चलते पाँव थक गए बिना बिचारे बैठ गए जो प्यासे थे घुटनों के बल नदी किनारे बैठ गए अंधियारे के तालमेल की अपनी एक कहानी है दिन वाले सूरज के घर में रात सितारे बैठ गए बैठे हैं कुछ लोग इस तरह लोकतंत्र की छाया में जैसे किसी पेड़ के नीचे कुछ बंजारे बैठ गए...
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Dr. Chandra Kumar Jain
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[22 Oct 2009 03:27 AM]



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