रहीम संदेश-मतलब का प्यार कम होने लगता है (matlab ka pyar-rahim ke dohe)

शब्दयोग सारथी-पत्रिका कविवर रहीम कहते हैं कि ----------------- वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत घटत घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत स्वाभाविक रूप से जो प्रेम होता है उसकी कोई रीति नहीं होती। स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम तो धीरे धीरे घटते हुए समाप्त हो जाता है। ज... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

dharm

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[21 Oct 2009 22:01 PM]

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