एक आवाज़ जो घुटकर रह गई...
आखिरी विदाई का वक्त था , तो माहौल थोड़ा ग़मगीन होना लाज़िमी था... जिसे अपने खून पसीने से सींचकर आशियां बनाया था, वो डेढ़ साल में ही ज़मीदोज हो गया... जिन सपनो में पंख लगाकर उड़ने की कोशिश की थी, उन्हे एक झटके में ही किसी ने कतर डाला था... तमाम किले ब...
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अबयज़ ख़ान
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[21 Oct 2009 08:30 AM]



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