लाचारी
छोटी छोटी आँखों से उम्मीद को रोज़ झांकते देखता हूँ, आस के चमकीले कणों से सने हाथ छिले देखता हूँ. अंगार सी सड़क पे नंगे पैर बचपन झुलसते देखता हूँ, थर-थराती सर्दी में नंगे जिस्मों को सिकुड़ते देखता हूँ. नन्हे कंधे स्कूल के बस्ते से नहीं मजदूरी के बोझ से...
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●๋• नीर ஐ
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[21 Oct 2009 05:43 AM]



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