माया, नज़रिया और ज्ञान

कवितायन हम, सिर्फ पैकिंग बदलने को बदलाव / परिवर्तन का नाम दे देते हैं और खुद भी भ्रमित हो जाते हैं शायद, माया इसी को कहते हैं हम, जितना देख पाते हैं बस वहीं समेट लेते हैं दुनिया को और सिखाते हैं क्षितिज की परिभाषा शायद, नज़रिया इसी को कहते हैं हम, जितना जानते... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[21 Oct 2009 03:12 AM]

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