झूठ भी सच सा जहाँ है
पिछली ग़ज़ल पे आप सब से मिली हौसलाफजाई और गौतम भैय्या से हुई बात को दिल में संजो कर आ गया हूँ एक छोटी बहर की ग़ज़ल के साथ। गुरु जी ने अपना बेशकीमती वक्त देकर इसे इस लायक बनाया है. बहरे रमल मुरब्बा सालिम ( २१२२-२१२२) झूठ भी सच सा जहाँ है। प्रेम की ये वो ज...
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अंकित "सफ़र"
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[21 Oct 2009 02:28 AM]



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