अपने हिस्से का सूरज

मेरी रचनाऍ मैंने तुमसे मुठ्ठी भर प्रकाश माँगा था और बदले तुम मेरे अन्धेरों पे   सुहानुभुती मैं दो शब्द बोलने लगे   अच्छा तो नहीं लगा   पर फिर भी मैंने कृतज्ञता प्रगट की   और मैं कर भी क्या सकता था   तुम्हें अपना समझ के कुछ मागाँ था... [पूरी पोस्ट]
writer विपिन बिहारी गोयल
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[20 Oct 2009 08:45 AM]

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