माना मद्धम है
माना मद्धम है, थरथराती हैफिर भी इक लौ तो जगमगाती है मैं अकेला कभी नहीं गातावो मेरे साथ गुनगुनाती हैहां ये सच है के कुछ दरख़्त कटेएक बुलबुल तो फिर भी गाती हैमैं अकेला कहां मेरे मन में एक तस्वीर मुस्कराती हैआँख कितनी ही मूंद ले कोईज़िन्दगी आइना दिखाती...
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Dr. Amar Jyoti
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[20 Oct 2009 08:45 AM]



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