इन बन्धनों से ..........!

कलरव नारी....... त्याग और उत्तरदायित्वों से सराबोर परंपरायें भी सिर चढ़ के बोलती हैं हां तुम्हें नहीं मुंह मोड़ना बरकरार रखना है अपनी परंपराओं को बरबस ही कैसे बच सकती है सामाजिक सरोकार अपनी संपूर्णता लिये आच्छादित हो जाते हैं विरोध का स्वर छिप सा जाता है न... [पूरी पोस्ट]
writer हेमन्त कुमार
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[19 Oct 2009 04:34 AM]

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