मुरली तेरा मुरलीधर 28
उसका ही विस्तार विषद ढो रहा अनन्त गगन मधुकर मन्दाकिनी सलिल में प्रवहित उसकी ही शुचिता निर्झर उस प्रिय का अरविन्द चरण रस सकल ताप अभिशाप शमन टेर रहा पीयूशवर्षिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।151।। मिलन स्वप्न कर पूर्ण जाग मनम...
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हिमांशु । Himanshu
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[19 Oct 2009 03:06 AM]



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