खुद को मिटाती चली गई

अनुभूति कलश खुद को मिटाती चली गई तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई। दस्तूर-ए-दुनिया के निभाती चली गई॥ चारो तरफ रिवाज़ों की भीड़ है खड़ी, रस्में-वफ़ा मैं फिर भी निभाती चली गई। तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥ चाहत में तेरी खुद को मिटा डाला है मैंने,... [पूरी पोस्ट]
writer ramadwivedi

खुद को मिटाती चली गई

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[19 Oct 2009 03:03 AM]

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