शत-शत दीप जलाएँ
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' अँधियारे के सीने पर हम शत-शत दीप जलाएँ ; दिल में दर्द बहुत है माना, फिर भी कुछ तो गाएँ । दुख की नदी बहुत है लम्बी बहुत ही छोटी नैया , छप-छप करती तिरती जाती पार पहुँचती भैया ! दूर किनारा ,गहरी धारा देख नहीं घबराएँ । आँसू और...
[पूरी पोस्ट]
सहज साहित्य
14
0
0
0
4
[18 Oct 2009 05:26 AM]



Shuffle








