दीपावली फिर टल गई

सृजन और सरोकार दीपावली फिर टल गई (a poem by ravi kumar, rawatbhata) आफ़ताब का दम भरने वाले दिए की लौ से खौफ़ खा गए आखिर ब्लैकआउट के वक्त उनके ही घर से रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम वे कैसे उठा सकते थे आफ़ताब के सपने संजोती उनकी ओर ताक रही निगाहें नागहां बौखला गईं और चूल्हों... [पूरी पोस्ट]
writer रवि कुमार, रावतभाटा
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[17 Oct 2009 09:30 AM]

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