मुरली तेरा मुरलीधर 27

अखिलं मधुरम् खड़े दर्शनार्थी अपार दरबार सजा उसका मधुकर उपहारों की राशि चरण पर उसके रही बिछल निर्झर मुखरित गृह मुँह जोह रहे सब किन्तु न जाने क्यों आकुल टेर रहा है प्रियाविरहिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।146।। प्रथम रश्मि की स्मिति में मधुरिम... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु । Himanshu
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[16 Oct 2009 21:37 PM]

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