पीड़ा ........ [कविता] - अमिता ’नीर’
उर में पीड़ा रोये ऑंखों से लोहू बरसे तेरी स्मृति की सुरभि मानस में धीरे बरसे घन तम में पीड़ा रोयी आंखों से लोहू बरसा आंखों का बेकल पँछी युग युग से तुमको तरसा दुख दर्द भींच होंठों में हमने चाहा मुस्काना बह चली अचानक पीड़ा आंखों नें रोना जाना हा देव !...
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श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
अमिता 'नीर'
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[16 Oct 2009 21:01 PM]



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