खंभा
अब त्योहार भी आतंक के साये में मना रहे हैं लोग । खैर, कोई गल नहीं। आएं जमकर मनाते हैं, रोशनी के इस उत्सव को। आप सब को दीपावली की बधाई। पर किसी की एक कविता याद आती है। आपको भी सुनाए देता हूं। रोशनी की जनमगाती फुहार के नीचे अंधेरा सहसा और भी घना हो चला...
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खंभा
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[16 Oct 2009 07:44 AM]



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