दीपमलिके
दीपमलिके , हम तेरे इन्तजार में घर सजा के बैठे रहे मन भी है सजता यूँ ही इस बात से अछूते रहे होती है दीवाली किसी की उपहारों से भरी हो जाते हैं उनमे ही गुम और किसी की यूँ दिवाली तेल है न रुई बाती हो जाए बत्ती ही गुल स्वागत हैं करते जलते दियों का है नहीं...
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शारदा अरोरा
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[16 Oct 2009 04:55 AM]



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