भूख के घर दीवाली नहीं मनती है
सीधी रस्सी पर चलती हुई चलते चाकू से टलती हुई नन्हे बदन सहित छोटे से चक्कर में से निकलती हुई उस बच्ची पर नजर टिकी लगी नहीं हुई फिसलती हुई बैठे पिता के आदेश पर खड़ी मां के आवेश पर उसके चंचल पैर बड़े सधे से रस्सी पर चल रहे थे जैसे दो नन्हे सितारे आकाशगंगा...
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चेतना के स्वर
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[16 Oct 2009 04:29 AM]



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