ये तितली
एक तरफ दीपों के त्यौहार की सजावट तो दूसरी तरफ चुनावी माहौल की गिरावट ,गोया खूबसूरत मखमल पर पैवंद लग गया हो ;ख़ुदा करे सब शांति से संपन्न हो जाये ;कहीं मेरी ग़ज़ल फिर न सिहर के कह उट्ठे ; अंधेरों मैं जो आज इक रौशनी मालूम होती है ये बस्ती अम्न की जलती...
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लता 'हया'
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[15 Oct 2009 04:50 AM]



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