कातिल

कुमार आशीष रोशनी झरती हुई हो जिसके कदमों के तले ...प्‍यास, इक उतरी हुई दरिया कि जैसे बह चले प्‍यास जो छेड़ो तो धुन सरगम के बिखरेंगे हुजूर प्‍यास जो कौंधे तो फिर कातिल से मिलती है गले... [पूरी पोस्ट]
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[15 Oct 2009 02:55 AM]

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