रोजाना
कविता) देखिये जनाब, आज का दिन, फिर ऐसे ही गुजर गया, मै सुबह उठा, चाय, सिगरेट, अखबार, यानी वही सब रोजाना के बाद, मै यही सोचता रहा, कि आख़िर ऐसा कब तक चलेगा !! ******************************** फिर जनाब मै दफ्तर गया, फाइल, दस्तखत, साहब की झिड़की, यानी क...
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प्रकाश गोविन्द
Poems
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[19 May 2009 15:07 PM]



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