दुर्गम मृत्यु-चक्र में जीवन

स्वर - चित्रदीर्घा बचपन में सर्कस देखने जाते समय जैसा कौतूहल व अवाक् भाव लिए लौटते थे, उसमें "मौत का कुआँ" जैसे "खेले" बंद गोले में होने और मेले-ठेले में दिखाए जाने के बावजूद भी लगभग अविश्वसनीय-से और भयोत्पादक हुआ करते थे| आप सबने भी देखा ही होगा वह "मौत का कुआँ "|&nbs... [पूरी पोस्ट]
writer कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[14 Oct 2009 10:32 AM]

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