दिन-दहाड़े

गठरी जब गुंडे पाँव पकडें , नेताजी मुस्कुराये | जनता समझ गयी है , फिर से चुनाव आये || बंटने लगी है दारु मिलने लगा है पैसा | कन्फ्यूज हुआ वोटर , किसका बटन दबाये ? जी भर के दे रहे हैं , एक दूसरे को गाली | मुंह है या गन्दी नाली , कोई समझ न पाये || सबको मिलेगा... [पूरी पोस्ट]
writer GATHAREE
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[09 Oct 2009 00:48 AM]

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