ये दे पटवारी ला फेर छरे हे, काबर कि रावन नई जरे हे
हमर पटवारी भईया के गोठ ला आघू बतावत हवं, पटवारी भईया ला समाज सेवा करे के बिमारी ता हवय, कईसनो भी बुता हो ही वो हा नई करवं कहिके नई कहय, सरलग १० दिन भले लग जाये फेर बुता सामाजिक होना चाही, बिना खाए पिए लंघन भूखन रही के, करही। अभी का होईस के टूरा...
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ललित शर्मा
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[14 Oct 2009 10:31 AM]



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