एक ख्वाब...एक सवाल...एक दुआ...
ए महबूब मेरे तू मेरी यादों में है, मेरे ज़हन में है, मेरे ख्यालों में है. पहर दर पहर यूँही गुज़र जाते हैं, तू ज़बान में है, मेरी आँखों में है. परेशान सी है कुछ मैंने सुना है, घर लाने का तुझे सपना बुना है. डरता हूँ समाज से अपने मैं भी, ज़िक्र पे तेरे मै...
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●๋• नीर ஐ
My Poems
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[06 Oct 2009 09:02 AM]



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