यह पीड़ामयी बयार

बातें जो छूट गईं बह चली है कैसी, पीड़ामयी यह बयार, जो बुनती रहती है, विपुल क्रन्दन अपार, अनायास ही दे जाती है अनचाहे मुझको अश्रु उत्स उधार, प्रणय का तुम्हारा चुंबन मेरी स्मृति बराए जूं आहार, हाय, नेस्ती छाई है बन जीवन विहास. उसकी वाय में घुलना तुम्हारा ए मेरे अवरुद्ध... [पूरी पोस्ट]
writer aneeta
views
7
upvote
1
downvote
0
rating
1
comments
0
[10 Oct 2009 08:41 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix