एक दुनिया ये भी
दुनिया से परे भी एक दुनिया है ऐसी बहुत सुनी-बहुत देखी, फिर भी है अनदेखी सी सोचो तो है आम ये दुनिया, लेकिन है कुछ खास वो दुनिया सोचो तो बेगानी सी और सोचो तो है अपनी सी बचपन बढता इसके सहारे, फिर इसमें जवानी ढलती है बुढ़ापे में भी साथ निभाए, कुदरत की ये...
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vikas vashisth
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[09 Oct 2009 00:42 AM]



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