नज़र शरीफ़ों की चुपके से तालिबान बनी
दोस्तों! कई दिनों से व्यंग्य पोस्ट कर रहा हूँ। आज आपको ग़ज़लों से रूबरू कराते हैं। सामयिक ग़ज़लें। इन्हें आप व्यंग्यनुमा ग़ज़ल या ग़ज़लनुमा व्यंग्य कह सकते हैं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'समावर्तन' ने सितंबर अंक में इन ग़ज़लों को प्रकाशित किया है।...
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ओम द्विवेदी
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[06 Oct 2009 11:37 AM]



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